कारवाँ में जीते आए है हम, कोई अपना ठिकाना ना था.

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कारवाँ में जीते आए है हम,
कोई अपना ठिकाना ना था.
थम गये बन के, रुके पानी की तरह,
फिर एक दिन तो बारिश को आना ही था.
बस फिर क्या था बह चले फिर अपने साहिल में मिलने,
बहते हुए फिर नये आशियाना को जगमगाना जो था.
हर नये रास्ते को मुश्कूराहटें देके मुझे,
एक ना एक दिन तो जाना ही था.

                                               Written By : रश्मि

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